Wednesday, 1 July 2015

एड़ी मसल रही थी , मैं प्यास मल रही थी
इक आग लग चुकी थी, और मैं पिघल रही थी
जोश-ए- जुनूँ की हद ने , पागल बना दिया जब
साहिल को रौंद कर मैं ,पानी पे चल रही थी

4 comments:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 2 - 06 - 2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2024 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

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