Thursday, 6 June 2013

जुदाई

 पत्ते ज़र्द हो गए जुदा होकर, वृक्छ की शाख से, 
'भभकती लॊ'की रौशनी बुझ सी गयी हो जैसे राख से,
 हम सोचते ही रह गए जिंदगी की अनसुलझी पहेली, 
मैं तनहा क्यों हूँ आज भी इस महफ़िल ऐ साज़ से।
...........................................कमला सिंह 

patte zard ho gaye juda hokar vrich ki shaakh se 
bhabhakti lau ki roshni bujh gayi ho jaise rakh se 
hum sochte reh gaye zindgi ki unsuljhi paheli.
mai tanha kyu hun aaj bhi is mehfil-ai saaz se ....
................................................kamla singh जुदाई 

9 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (09-06-2013) के चर्चा मंच पर लिंक की गई है कृपया पधारें. सूचनार्थ

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  2. bahut khoob.....!!
    kamal kar diya Kamla Singh ji..!
    laazwab..........!

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  3. वाह बहुत ही सुन्दर रचना चित्र को सुन्दरता से परिभाषित किया है आपने बधाई स्वीकारें.

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  4. सुन्दर रचना, हम सोचते ही रह गए जिंदगी की अनसुलझी पहेली, मैं तनहा क्यों हूँ आज भी इस महफ़िल ऐ साज़ से

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  5. यही तलाश है....जो भटकाती है ....सुंदर भाव !

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  6. प्रश्न अनुत्तरित है ,अभिव्यक्ति अच्छी
    अनुशरण कर मेरे ब्लॉग को अनुभव करे मेरी अनुभूति को
    latest post: प्रेम- पहेली
    LATEST POST जन्म ,मृत्यु और मोक्ष !

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  7. सुंदर रचना में गजब के भाव. बधाई कमला जी

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  8. कमला जी अपने भावों को बड़े ही सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किया है | बधाई
    राम किशोर उपाध्याय

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  9. aap sabhi ki aabhari hu mai tahe dil se , meri rachna ke liye

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