Monday, 16 September 2013

चाँद बहुत ही दूर है लेकिन चाँद पे चलकर देखेंगे 
चाँद की मिटटी के सुरमे को आँख पे मल कर देखेंगे 
या तो चांदनी बनकर यारों बिखरेंगे गुलशन गुलशन 
ऐसा गर मुमकिन ना हुआ तो चाँद में ढलकर देखेंगे 
-------------------------------------------कमला सिंह ज़ीनत 

Chaand bahut hi duur hai lekin chaand pe chalkar dekhenge Chaand ki mitti ke surme ko aankh pe mal kar dekhenge Ya to chaandni bankar yaro bikhrenge gulshan gulshan Aysa gar mumkin na huaa to chaand me dhalkar dekhenge.
--------------------------------kamla singh zeenat

3 comments:

  1. सुंदर रचना...
    आप की ये रचना आने वाले शुकरवार यानी 20 सितंबर 2013 को नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही है... ताकि आप की ये रचना अधिक से अधिक लोग पढ़ें...
    आप भी इस हलचल में सादर आमंत्रित है... आप इस हलचल में शामिल अन्य रचनाओं पर भी अपनी दृष्टि डालें...इस संदर्भ में आप के सुझावों का स्वागत है...
    उजाले उनकी यादों के पर आना... इस ब्लौग पर आप हर रोज 2 रचनाएं पढेंगे... आप भी इस ब्लौग का अनुसरण करना।



    आप सब की कविताएं कविता मंच पर आमंत्रित है।
    हम आज भूल रहे हैं अपनी संस्कृति सभ्यता व अपना गौरवमयी इतिहास आप ही लिखिये हमारा अतीत के माध्यम से। ध्यान रहे रचना में किसी धर्म पर कटाक्ष नही होना चाहिये।
    इस के लिये आप को मात्रkuldeepsingpinku@gmail.com पर मिल भेजकर निमंत्रण लिंक प्राप्त करना है।



    मन का मंथन [मेरे विचारों का दर्पण]

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