Thursday, 28 August 2014

एक अमृता और 
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सिगरेट कहाँ है इमरोज़ ?
सुलगाओ न 
सुनो ,दो सुलगाना 
एक मेरे लिए  और दूसरा खुद के  लिए 
आओ बैठो मेरे पास 
कुछ अपनी कहें, कुछ तुम्हारी सुनें  
दुनिया का दिल बहुत जल चुका  
अब अपना दिल जलाएं
क्या हुआ  … ?
पता है इमरोज़  .... यह धुआँ देखो 
ज़रा गौर से देखो इसे, 
विलीन होता देखो इसे 
ऊपर की ओर  
यह मैं हूँ  …… देखो न 
जो ऊपर चली जा रही है 
अरे वाह ! ये मेरा भी आखिरी ही  कश है 
और तुम्हारा भी  … 
ये भी एक इत्तेफ़ाक़ ही है
हा हा हा हा  ....  
सब कुछ धुआँ धुआँ   धुआँ धुआँ … 
    
--कमला सिंह 'ज़ीनत'

2 comments:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (29.08.2014) को "सामाजिक परिवर्तन" (चर्चा अंक-1720)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

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