Monday, 4 August 2014

सुबह से शाम तलक साथ साथ चलता है वह मीठे पानी के चश्मे सा ही उबलता है कभी न आने वह देता है लब पे खुश्की को सुलगते लब पे वह एहसास सा पिघलता है कमला सिंह 'ज़ीनत'

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