Wednesday, 9 July 2014

या सूरज निकलेगा ________________________ रोज़ ब रोज़ बगै़र रुके बढ रहा है मेरे वजूद का साया उस ओर यह जानते हुए भी दुनिया गोल है और लोट आना है फिर साया जनूनी है मेरा तलाश की लम्बी राह वहाँ कुछ तो होगा तमन्नाओं की गेसुओं को सुलझाता बढ रहा है रोज़ ब रोज़ मेरे जैसा ही मेरा साया मंजि़ल ए मकसूद को नज़र में समेटे थकान के शामियाने तानते हुए ठहराव का कोई सिरा नहीं दिखता जहाँ से दुनिया अपनी गोलाई समेटेगी कहा है उसके कानों में किसी ने अभी नया सूरज निकलेगा बेतरतीब साया बढ रहा है रोज़ ब रोज़ दास्तान ए किस्सा गो की कहानी बने हसरत का एहसासी टोकरा उठाए बे निशाँ सफर की ओर साथ मैं भी हूँ खामोश ,चुपचाप बिल्कुल चुपचाप कमला सिंह 'ज़ीनत'

14 comments:

  1. बहुत गहन और ख़ूबसूरत प्रस्तुति...

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  2. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 10-07-2014 को चर्चा मंच पर उम्मीदें और असलियत { चर्चा - 1670 } में दिया गया है
    आभार

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  3. कभी न कभी अपनी भी सुबह जरूर होती है

    बहुत बढ़िया
    अच्छा लगा आपका ब्लॉग पढ़कर और ब्लॉग पर आकर

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

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  5. बहुत सुंदर प्रस्तुति!

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  6. उमीदों में आग लगी हो तो,
    सूरज दिल में बनता है...........गर्मी इतनी ज्यादा है की सूरज न निकलने में ही फायदा है.

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  7. वाह !! एक अलग अंदाज़ कि रचना ......बहुत खूब

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  8. बेहतरीन रचना..

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