Tuesday, 24 June 2014

अपने भी अब तो छलने लगे हैं 
रंग गिरगिट सा बदलने लगे हैं 
रिश्तों की मर्यादा रही अब कहाँ 
खून भी  खून से जलने लगे हैं
----कमला सिंह 'ज़ीनत' 

3 comments:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 26-06-2014 को चर्चा मंच पर चर्चा -1655 में दिया गया है
    आभार

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  2. लेकिन...चन्दन विष व्यापत नहीं लिपटे रहत भुजंग...यदि आप अच्छे हैं तो बदलने की कोशिश नहीं कीजियेगा...

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