Monday, 7 April 2014

उलझनो से लिपटी रहती है हर वक़्त ये साँसें मेरी 
उलझनें रूह बन गयी हैं या रूह उलझनों का गुलशन 
---------कमला सिंह 'ज़ीनत'

पास अब कभी न आउंगी,दिल को भी यही समझाउंगी 
वो था कभी नहीं 'ज़ीनत' का,रोज़ ज़ख्मों को सहलाऊँगी 
----------कमला सिंह 'ज़ीनत'

आज बे-वफ़ा का ज़ख़्म भी सुकूं देता है 'ज़ीनत' को 
बरसों बाद बादल भी घुमड़े रहे  हैं इन बंज़र आँखों में 
------कमला सिंह 'ज़ीनत'  

1 comment:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (08-04-2014) को "सबसे है ज्‍यादा मोहब्‍बत" (चर्चा मंच-1576) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    श्रीराम नवमी की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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