Sunday, 21 July 2013

लिख लिख के मिटाने की जगह खुद ही मिटती रही हूँ मैं 
हस-हस के जिंदगी से लड़ने की जगह लिपटती रही हूँ मैं 
वो सच भी था मेरा और ख्वाब भी, जिंदगी के हालात भी 
जो भी था वो तकदीर था बीता,बार-बार उससे पिटती रही हूँ मैं
------------------------------------------------------कमला सिंह 'जीनत'  

1 comment:

  1. प्रशंसनीय रचना - बधाई
    शब्दों की मुस्कुराहट पर .... हादसों के शहर में :)

    ReplyDelete