Wednesday, 28 May 2014

टुट जायेंगे यकीनन वह सारे शीशे के बुत इक धमक काफी है लफ्जों को जो जुंबिश दे दूँ
कमला सिंह 'ज़ीनत'

यूँ तो रुखसार ही होते हैं किताबी पन्ने
दीदवाले तो मोकम्मल ही पढ़ा करते हैं
---कमला सिंह 'ज़ीनत'


मुझको दीवारों में जड़ दे
या फिर मुझको पागल कर दे
आँखें मेरी सूख चुकी हैं
चल तू आँख में आंसू भर दे
---कमला सिंह 'ज़ीनत'

8 comments:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 29-05-2014 को चर्चा मंच पर चर्चा - 1627 में दिया गया है |
    आभार

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  2. मुझको दीवारों में जड़ दे
    या फिर मुझको पागल कर दे
    आँखें मेरी सूख चुकी हैं
    चल तू आँख में आंसू भर दे
    बहुत सुन्दर !
    new post ग्रीष्म ऋतू !

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  3. सुन्दर भाव...

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