Saturday, 24 August 2013

------------ग़ज़ल -----------
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मैं खुद से खुद को भुला बैठी 
दिल जो तुझसे लगा बैठी 

भूल गयी,डगर मंजिल का 
तेरे दर से ही राह मिला बैठी 

नशा होता है क्या इश्क का 
आँखों को जाम पिला बैठी 

बंदगी इश्क में तेरे यार मैं  
दिल का चमन खिला बैठी 

अंजाम-ए-इश्क में हासिल 
अश्कों से दामन भीगा बैठी 
--------------कमला सिंह ज़ीनत  

3 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल - सोमवार- 26/08/2013 को
    हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः6 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया आप भी पधारें, सादर .... Darshan jangra

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  2. आपकी इस प्रस्तुति की चर्चा कल सोमवार [26.08.2013]
    चर्चामंच 1349 पर
    कृपया पधार कर अनुग्रहित करें
    सादर
    सरिता भाटिया

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति। ।

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