सुन रहे हो इमरोज़
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तुम
बस तुम हो
मेरी क़लम में
मेरे एहसास में
मेरी जुस्तजू में
मेरी आरजू़ में
मेरे एक एक शब्द में
मेरी एक एक पंक्ति में
मेरी इबादत में
मेरे सजदे में
मेरी हुनर के गोशे गोशे में
हर कहानी में
बस तुम हो
मेरे हर ब्यान में जि़क्र है तुम्हारा
मेरे नाम के साथ ही
या कहो तुम्हारे नाम के साथ साथ
हमारा और तुम्हारा इक अटूट बंधन है
न मिटने वाली एबारत है
न ख़त्म होने वाली कहानी है
इक सिलसिला सा है हम में
इक सिलसिला सा है तुम में
जनूनी हूँ मैं थोडी़ जि़द्दी भी
लेकिन तुम्हारे लिये केवल
सुलझी ,सौम्य ,शांत 'अमृता '
कल की कहानी अभी अधूरी है
लिखूँगी
क्या नाम दूँ सोचा नहीं है अभी
कहाँ अन्त करुँ तय नहीं किया है
सुन रहे हो न 'इमरोज़'
सो गये क्या ?
तुम्हारी 'अमृता 'तुमसे ही मुखा़तिब है ।
कमला सिंह 'ज़ीनत'
Chat Conversation End

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (22.08.2014) को "जीवन की सच्चाई " (चर्चा अंक-1713)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।
ReplyDeleteसुंदर भाव-पूर्ण रचना.
ReplyDeletebahut aabhar aapka rakesh ji
Deleteप्यारी रचना व लेखन , धन्यवाद !
ReplyDeleteI.A.S.I.H - ( हिंदी में समस्त प्रकार की जानकारियाँ )
behad shukriya aap ko bhi
Deleteबेहद उम्दा प्रस्तुति |
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