Saturday, 8 February 2014

बिक गया है ऐ ख़ुदा इंसान तेरे जहान का  
करता है मोल भाव बैठ कर कब्रिस्तान का 
क़ीमत नहीं कुछ भी ज़मीर और ईमान का  
बिक रहा है धीरे धीरे खून हिंदुस्तान का 
--------कमला सिंह 'ज़ीनत'

Friday, 7 February 2014

एक नज़म 
--------------
तुम किधर चले जाते हो ?
यूँ तन्हां छोड़कर 
मेरे महबूब ,मेरे हमसफ़र 
मेरे पास आओ 
बैठो न ,
कुछ बातें करो ,कुछ बोलो भी 
कितनी बेचैन सी रात है 
साँसों के लरजने कि आवाज़ है 
लेकिन कितना सुकून है....  
इस मौत  सी सन्नाटे में भी  
मद्धम मद्धम आ रही है आवाज़ें 
पर तुम ना जाने  कहाँ खो जाते हो .... 
इस सियह रात में ,
एक इंतज़ार को छोड़कर मेरे पास 
क्यूँ करूँ इससे दोस्ती ?
ये भी तो तुम्हारी ही बातें करती हैं 
हर वक़्त लिपटी रहती हैं मुझसे 
देखो इस चांदनी रात को 
कितना प्यारा है 
खुश है अपनी चांदनी के साथ 
मेरे भी कुछ अरमां हैं 
कुछ हसरत हैं 
संग तुम्हारे जीने की 
वो पल जो अनमोल हों 
वो पल जो नायाब हों 
ज़िंदगी बिताने के लिए 
ऐसी व्यथा देते ही क्यूँ हो ?
देखो तुम्हारे दिए ख्वाबों को 
सितारों सी लिपटी दमक रही हूँ मैं 
बताओ कैसी लग रही हूँ मैं ?
आओ न हमराह चलें। … 
जब तक घड़ी और रात चले 
मासूम सी हसरतें हैं 
तुम्हारे हाथों सजने की 
आशियाने में बसने की 
मुंतज़िर हूँ अब तक 
आओ ना महबूब मेरे 
क्यूँ चले जाते हो 
क्यूँ चले जाते हो 
यूँ तन्हां छोड़कर  .......... . 
…कमला  सिंह 'ज़ीनत'
--------------ग़ज़ल-----------------------
-------------------------------------------
जो लोग फिक्रे अदावत में पलते रहते हैं 
वही ज़माने से  दिन रात जलते रहते हैं 

जो  गिर चुके हैं ज़माने में अपनी नज़रों से 
वह अपने आप ही गिरते संभलते रहते हैं 

जो हाँडियाँ हैं खबासत कि मोख्तसर लेकिन 
वह  बुलबुले  कि  तरह  से उबलते रहते हैं

जिन्हें ना शिकवा है ग़ैरों से फ़िक्र है अपनी 
वह अपनी धुन में में सरे राह चलते रहते हैं 

हसद के साथ जो भरते हैं दोस्ती का दम 
वह दोस्ती में  भी पहलू   बदलते  रहते हैं 

जो चाहते हैं कि बन जाएँ हम ज़ीनत' कि तरह 
नसीब  देखो  के वह  हाथ  मलते  रहते  हैं  
--------------------कमला सिंह ज़ीनत 
---------------ग़ज़ल--------------
-----------------------------------------
क्यूँ पूछते हो ताल्लुक मेरा ,सारे ज़माने से 
खुद ही बता दो रिश्ता मेरा क्या तेरे फ़साने से 

अंधेरों का बना डेरा ,मेरे ही आशियाने में
सवालों से घिरी हूँ मैं ,तेरे एक दूर जाने से 

मयस्सर है नहीं सुकूँ तुझको भी तेरे दिल में 
ख्यालों को मेरे खुद के तेरे दिल में बसाने से 

परेशाँ   है  तू ,  तेरा   वजूद  भी   है   परेशां    
तड़पता   है  मुहब्बत को मेरे तू आजमाने से  

साथ  रहने से मेरे  तुझे तकसीम मिलती है 
बड़ी तक़लीफ़ होती है मेरे एक दूर जाने से 

क्यूँ-कर  भागता  है  ज़ीनत  कि  परछाईं  से 
जानता  है मिट जाएगा तू ,मुझको मिटाने से 
------------------कमला सिंह ज़ीनत 

Monday, 27 January 2014

       बेबसी  
--------------------------
रेशम से सफ़ेद बाल उसके 
दर्द और थकन से पिचके गाल 
चेहरे पर लाखों तहरीरें थी 
झुकी कमर और फटी शाल 
सब कुछ है जिस्म के नाम पर 
हड्डियों का पिंजर,और फटे हाल 
कंपकंपाते हाथ में कटोरा 
रुंधा गला और फटा त्रिपाल 
अमीरों का महल भी देखा 
और भ्रस्टाचार का जाल 
वाह रे 'खुदा 'क्या बनाया तूने 
बेबस की क़िस्मत और उसका हाल 
------कमला सिंह 'ज़ीनत'

Sunday, 26 January 2014

सुन्दर सुन्दर मुल्क है लेकिन अपना मुल्क ये प्यारा है 
दुनिया के होठों पर हमने ही मुस्कान उभारा है 
हम सबने मेहनत के बल पर ,सूरज चाँद उतारा है 
सबसे सुन्दर सबसे प्यारा भारत देश हमारा है 
-------------------------कमला सिंह 'जीनत' 
Sundar sundar mulk hain lekin,apna mulk ye pyaara hai
duniya ke hoton par hamne,hi,muskaan ubhaara hai
ham sabne mehnat ke bal par,suraj chaand utaara hai
sabse sundar,sabse pyara,bharat desh hamara hai
----------------------------kamla singh 'zeenat'

Saturday, 25 January 2014

-----उम्मीद -----
-----------------------
चिलचिलाती धुप में 
निगाहों पे हाथ का साया 
उम्मीद से भरी नज़रें उसकी 
ढलती सी पतली काया 
टुकर-टुकर देखती दुनियां को 
ना क्रोध ना कोई हमसाया 
इक झलक पाने को पगली
ना कोई लोभ ,न माया 
सुहाग या कोख़ का मर्म 
क्या होता है ऐ भाया 
पीड़ सोचो सब उसकी 
जिसने है वक़्त से ये पाया 
---कमला सिंह 'ज़ीनत'