Saturday, 20 June 2015

वो शाम
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याद है तुम्हें ? वो शाम
मेरा दिल जब बैठा जा रहा था
मैं काफी घबरा सी गई थी जब
पूरा बदन कांप रहा था जिस दम मेरा
और मैं बहुत डर गई थी
मेरा जी भी मतला रहा था
चक्कर भी आ रहा था
तुमने अपना हाथ मेरे हाथों में फंसाया
मेरा ढांढस बंधाया
दवाएँ मंगवाई
मुझे बडे प्यार से खिलाया
और उस वक्त़ तक तुम
ऊंगलियां फंसाए
लान में मेरे साथ टहलते रहे
जब तक कि मैंने
कुछ बेहतर महसूस न किया
आज भी सोचती हूँ
वो शाम
बहुत प्यारे से लगने लगते हो तुम
बताओ न मुझे
याद है तुम्हें ? वो शाम
----कमला सिंह 'ज़ीनत'
20/06/15
--------JADUGAR-----
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Tutne ko to sab toot jata hai
Log toot jate hain
Shakhen toot jati hain
Mahal toot jata hai
Raaste toot jate hain
Dil toot jata hai
Dewaaren toot jati hain
Pahaad toot jata hai
Lahren toot jati hain
Toofaan toot jata hai
Kashtiyan toot jati hain
Mallah toot jata hai
Are O JADUGAR
tera jadu nahin toot'ta re
tera jadu nahin toot'ta .
Kamla singh 'zeenat'

Thursday, 18 June 2015

मेरी एक ग़ज़ल
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तुम तो जाके बैठे हो गेसुओं के साये में
जल रही हूँ मैं अब भी बिजलियों के साये में
उँगलियाँ उठी होंगी तुम तो डर गए होगे
जी रही हूँ मैं लेकिन तल्खियों के साये में
क़ीमती जवानी थी जिसको तेरी गलियों में
छोड़ कर चले आये खिड़कियों के साये में
रौंदने लगी मुझको बेवफ़ाईयों तेरी
छटपटा रहे हैं हम सलवटों के साये में
क्यूँ जुदा नहीं करते क्यूँ भुला नहीं देते
टूटते हैं हम अक्सर दूरियों के साये में
तुम तो खुश हुए होगे इक न एक दिन शायद
मेरी उम्र गुज़री है हिचकियों के साये में
लड़ रही हूँ मैं तन्हा ज़ीनत अब हवाओं से
मसअला है जीने का आँधियों के साये में
--कमला सिंह 'ज़ीनत'
फूलों से आगे ---------------- मैं जब जब फूलों की बात करती हूँ तुमने खुशबू का जिक्र छेड़ दिया मैं गुलशन की रौनक ब्यान करती हूँ तुम बहारों में उलझ पड़ते हो कभी सुना भी करो मेरी कान बनकर कभी महसूस तो करो मेरा होकर सामने बैठो मेरे तन्हा होकर मुकम्मल मुझमें ही खोकर रहो चाहती हूँ जीना अपनी तरह से तुमको तुम्हारी तरह भी जी लूंगी मैं कहो तो लेकिन अभी चुप रहो खामोश रहो सुनो मुझे फूलों की बात आई है खुशबू तो आनी ही है मैं खुद बहारों का जिक्र करूंगी तितलियाँ भी आएंगी कुछ भौंरे भी होंगे मेरी ओर तको देखो मेरी ओर सुनो गौर से मुझे ये मेरी ख्वाहिश है मेरी ख्वाहिश तो चलो बताती हूँ फूलों से आगे......... -----कमला सिंह 'ज़ीनत'
18/06/15

Tuesday, 9 June 2015

एहसासों के मोल 
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तेरी दुनिया में 
एहसासों का मेरे 
कोई मोल नहीं 
ऐसा लगता है जैसे 
कचरे के डब्बे  से 
फेंकी हुई कोई चीज़ हो 
वही एहसास जो कभी 
तुम्हारे दिलो-दिमाग पर 
छाये रहते थे 
वही एहसास जिससे कभी 
मदहोशी का जाम 
पिया करते थे 
वही एहसास जो कभी 
तुम्हारे दिल  की 
धड़कन बढ़ा दिया करते थे 
वही एहसास जिसकी 
खुशबू  से 
तुम दिन रात 
भीगे रहते थे  … 
और 
आज वही कचरे में 
पड़े सड़ांध मार रहे हैं 
है न  …?
--कमला सिंह 'ज़ीनत'

Monday, 8 June 2015

मुहब्बत की कश्ती में 
सवार होकर मैं 
निकल आई बहुत दूर 
बहुत ही दूर  .... 
जब किनारे पर 
दूसरी ओर पहुँच कर 
उतरना चाहती हूँ  तो 
कहते हो  
लौट जाऊँ तन्हा 
पर कैसे ,मुझे तो 
पानी से डर लगता है 
और फिर वो किनारा 
रेत की लकीरों के साथ 
एक हो चुका है 
किस किनारे पर जाऊँ मैं ?
किस किनारे पर जाऊँ मैं ?
--कमला सिंह 'ज़ीनत' 

ग़ैरों में और तुममें 
क्या फर्क है बोलो 
कुछ भी नहीं, 
कुछ भी तो नहीं 
वो रुसवा कर गया 
सरे बाज़ार … 
और तुम  
तुमने हुस्न को इश्क़ की दुलहन बना  
तलाक़ दे दिया
 क्या फ़र्क़ है ? 
दोष किसका  ?
मेरा या फिर मुक़द्दर का ?
बोलो ना किसका  .... 
--- कमला सिंह 'ज़ीनत'