Thursday, 10 April 2014

मेरी पुस्तक 'एक बस्ती प्यार की ' ग़ज़ल संग्रह कि एक और ग़ज़ल हाज़िर है दोस्तों 
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पूरे एहसास में ढल गए 
हम किसी खास में ढल गए 

बहते दरिया को छूते ही हम 
मुस्तकिल प्यास में ढल गए 

इतनी शिद्दत से चाहा के हम 
उसके ही सांस में ढल गए

रोज़ आँखों को उसकी कमी
उसकी ही आस में ढल गए

यूँ तो दुनिया बुलाती रही
और हम पास में ढल गए

वो गुजरता है ज़ीनत यह सुन
राह के घास में ढल गए
------कमला सिंह 'ज़ीनत'
मेरी ग़ज़ल संग्रह 'रेत कि लक़ीर' की एक ग़ज़ल पेश है 
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आँधियों से है साबिक़ा मेरा 
सख्त मुश्किल है रास्ता मेरा 

रोज़ उजड़े हैं रोज़ बिखरे हैं 
आप सुनते हैं हादसा मेरा 

मेरी राहों में इक समुन्दर है 
कौन ऐसे में है सगा मेरा 

खोटी क़िस्मत तो ज़िंदगी छोटी
साथ मुश्किल है आपका मेरा

पा-बजौलाँ हूँ जानती हूँ चुभन
खारदारों से वास्ता मेरा

ज़ीनत जी ज़िंदगी का वह आँगन
संगे-दिल कौन बाँटता मेरा
------कमला सिंह ज़ीनत
कुछ फूल भी 
कुछ ख़ार भी 
ये ज़िंदगी के बहार भी 
पल में खट्टी 
पल में मीठी 
ज़िंदगी के ग़ुबार भी 
हँसा दिया कभी 
रुला दिया कभी 
ये ज़िंदगी के दुलार भी 
गले भी लगाया 
गले से हटाया
ये ज़िंदगी है खुमार भी
ये ज़िंदगी है प्यार भी
ये ज़िंदगी है बहार भी
....कमला सिंह "ज़ीनत "
प्रेम की भाषा प्रेम होनी चाहिए 
न हिन्दू न मुसलमान होना चाहिए 
धङकता है दिल एक सा जिस्म में 
प्यार अपना ईमान होना चाहिए 
---------कमला सिंह "ज़ीनत "

Monday, 7 April 2014

उलझनो से लिपटी रहती है हर वक़्त ये साँसें मेरी 
उलझनें रूह बन गयी हैं या रूह उलझनों का गुलशन 
---------कमला सिंह 'ज़ीनत'

पास अब कभी न आउंगी,दिल को भी यही समझाउंगी 
वो था कभी नहीं 'ज़ीनत' का,रोज़ ज़ख्मों को सहलाऊँगी 
----------कमला सिंह 'ज़ीनत'

आज बे-वफ़ा का ज़ख़्म भी सुकूं देता है 'ज़ीनत' को 
बरसों बाद बादल भी घुमड़े रहे  हैं इन बंज़र आँखों में 
------कमला सिंह 'ज़ीनत'  

Tuesday, 1 April 2014

कितना दुःख दायी होता है दर्द संतान का
पश्चाताप होता है खु़द के मान सम्मान का
सोचती हूँ कुछ होता कुछ और है ज़माने में 
करता है बेटा अपमान जब माँ के अभिमान का
......कमला सिंह "जीनत "
एक रिश्ता ऐसा भी 
मनुष्य के झूठे दंभ का 
जिसे वो हर वक़्त ओढ़े रहता है 
लिबास झूठ और, 
दिखावे का
जहाँ दूर दूर तक कोई
चिंगारी नहीं भी नहीं 
उन रिश्तों के एहसासों की 
जिससे दिल से रिश्ते जुड़े हैं। 
दर्द की चुभन हो 
जिसके हसने से सुकून हो 
क्या कभी सोचा है ?
उस रिश्ते को ?
जिसने तुम्हारे जन्म से लेकर अब तक 
सिर्फ खुशियां और दुआएं दी हैं 
कभी कुछ नहीं चाहा सिवा 
एक या दो बातों के 
अपनापन और प्यार। ....... 
उसकी आँखों कि तड़प 
बयां करती है 
तुम्हारी बेरुखी,
झूठे  आडम्बर,
तरसती हैं वो बाहें आज भी 
तुम्हें एक बार अपनी 
छाती से लगाने के लिए 
तुम्हें दुआ से चूमने के लिए 
क्या तुम समझ पाये ?

मुझे दर्द है उस चुभन की,
मुझे दुःख है तुम्हारी बेरुखी पर,
मुझे दुःख है अपने कोख पर,
मुझे दुःख है खुद पर,
क्यूंकि 
मैं वो दीया  हूँ जो बुझने वाली है  
मैं  वो दर्द हूँ जो तड़पती है  
वो दयार हूँ जो फट चुकी हूँ 
वो दरख्त हूँ जो सुख चुकी है
आखिरकार  … …। 
मैं भी एक 
जीता जागता एहसास हूँ 
एक माँ हूँ 
तुम्हारे लिए दुआ हूँ 
तुम्हारे  लिए दुआ हूँ 
सिर्फ प्यार और दुआ  
------कमला सिंह 'ज़ीनत' 2 april 2014