Wednesday, 28 September 2016

यादों के उस पार गई मैं
जीत गई या हार गई मैं
--कमला सिंह "जी़नत"



यही  है आरज़ू  दिल की यही दिल का फ़साना है 
उसी बचपन की यादों को मुझे फिर से सजाना है 
ख़ुदाया  ज़िंदगी  पिछली  मुझे लौटा  दुआओं में 
मुझे  है  दौड़ना जी  भर,मुझे चरखी  नचाना   है 
---कमला सिंह 'ज़ीनत'

Wednesday, 21 September 2016

आज फिर मेरी ग़ज़ल आप सबके हवाले 
---------------------------------------------------
न तख़्तों -ताज ,नशेमन न गुहार माँगेंगे 
उठा  के  हाथ  दुआओं  में  असर  माँगेंगे 

ख़िजाँ  के साथ गुज़ारी है ज़िन्दगी अपनी 
बहार  आएगी  तो  हम  भी  समर माँगेंगे 

अभी  तो  पाँव  के  नीचे  ज़मीन  ठहरी है 
संभल तो जाने दे फिर,ख़ुद ही समर माँगेगे 

मेरा  ज़मीर अभी  कह के मुझसे लौटा है 
वतन पे आँच जो आएगी तो सर माँगेंगे 

चमन उजड़ गए तामीर हो गए हैं  शहर 
परिंदे  लौट  के आएँगे तो ,घर  माँगेगे 

क़बूल 'ज़ीनत'  गर 'तूर' की ज़्यारत हो 
दबी  ज़बान  से 'मूसा' की नज़र माँगेंगे
-----कमला सिंह 'ज़ीनत' 

Thursday, 21 July 2016

ताक बाती दीया उसी का है सब
वह जलाये बुझाये मर्जी- ए -रब
कमला सिंह 'ज़ीनत'


दो चार दिन ही बच गये मंजि़ल के हूं करीब
पीछे अब मुड़ के देखूं या आगे सफर करुं
कमला सिंह 'ज़ीनत'


मसअला सामने है पेचीदा फैसला भी नहीं उतरता है
पीछे वाला पुकारता है मुझे आगे वाला इशारे करता है
कमला सिंह 'ज़ीनत'


पर झुलसने की गर कहानी है
फिर तो परवाज़ आसमानी है
कमला सिंह 'जी़नत'


काफिर शुमार करके सही शैख मोहतरम
बुत मेरा मेरे साथ ही रखियो कफन तले
कमला सिंह 'जी़नत'


दो पल
________
बस खेल तमाशा है
मेला है ये दो पल का
जीवन जिसे कहते हैं
खुद आग लगाये हम
चढ़ते हैं बलंदी पर
इक मौत का कुआं है
जिस कुऐं में इक दिन हम
इस मेले झमेले में
इस खेल तमाशे में
कल कूद ही जायेंगे
कल दूसरे आयेंगे
जो खेल दिखायेंगे
हम हाथ मले तन्हा
इस दुनिया ए फानी से
कहते हुए जायेंगे
बस खेल तमाशा है
मेला है ये दो पल का
--कमला सिंह 'ज़ीनत'

Tuesday, 19 July 2016

मेरी एक ग़ज़ल 
------------------------
जब मुहब्बत के परिंदे को जी पर लगने लगा 
जाने क्यों  ऐसे  में अपनों से डर  लगने लगा 

प्यार जब हो गया तो ,फ़ितरतन ख़ामोश रही 
एक सुनसान सा मेरा  भी ये घर  लगने लगा 

होश  क्यों  खोती रही  उसके तसव्वुर में भला 
मुझको ये  तो मुहब्बत  का असर लगने लगा

जानी दुश्मन वो  मेरे  होश का आया ज़ालिम  
जिस्म एकदम से मेरा ऐसे में तर लगने लगा 

नींद  उड़  जाती  है आँखों  से थकन ओढ़े हुए 
जाके तकिए से परीशान - सा सर लगने लगा 

देखती  जब  भी  हूँ  'ज़ीनत'  ये  नज़ारा कोई 
टूटा बिखरा हुआ अपना ही ये दर लगने लगा 
-----कमला सिंह 'ज़ीनत'

Friday, 15 July 2016

चूर होकर जो दम -ब- दम उतरे
साथ कोई क़दम क़दम उतरे
उन ख़यालों की सीढियां चलकर
रफ़्ता रफ़्ता सँभल के हम उतरे
--कमला सिंह 'ज़ीनत'