Wednesday, 20 August 2014

चार मिसरे बतौर ए खा़स
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तेरे गुलशन में चहकने से ही दिल भरता है
बुलबुले चमने अदब चुप तेरी दुखदाई है
तू ही इज़्ज़त है सलामत है तुझी से ये बहार
तू नही है तो चमन वालों की रुसवाई है
____________कमला सिंह 'ज़ीनत'

Tuesday, 19 August 2014

मेरी प्रतिनिधि रचना और चर्चित ग़ज़ल जो बहुत पसंद की गयी, हाज़िर है दोस्तों 
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आईना   वो  है और सूरत मैं हूँ 
उसकी   दिन रात  ज़रूरत मैं हूँ 

दिल तो उसका है एक मंदिर सा 
उस दिले ख़ाना  की मूरत  मैं हूँ 

उसमे बसती हूँ मैं खुश्बू की तरह 
उसके  हर हाल की फितरत मैं हूँ 

सारे  अरमान उसके  पुरे किये 
खुद ही  इस बात पे  हैरत मैं हूँ 

नाम  उसका जुड़ा है  मेरे साथ 
इश्क़े  मशूहर की शोहरत  मैं हूँ 

वो  तलबगार  है  'ज़ीनत'  तेरा 
ख़्वाहिशें दिल है वो,हसरत मैं हूँ 
---कमला सिंह 'ज़ीनत'

Sunday, 17 August 2014

कलियुग में अब मचा पडा़ है देखो हाहाकार
ऐसे में ओ कृष्ण हमारे फिर से लो अवतार
चीर बचाना मुश्किल है अब निर्लज है संसार
करो हमारी रक्षा हेतु असुरों का संहार
--कमला सिंह 'ज़ीनत

Saturday, 16 August 2014

कोई याद न आये
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आज घर में मेरे बहुत सारे लोग जमे हैं
सभी के बीच मैं
व्यस्त ,व्यस्त ,व्यस्त
आज कुछ भी याद नहीं
कुछ भी नहीं
जी हलकान था
लेकिन अब
हलका लग रहा है
मेरी यादाश्त खो चुकी है
अब चाहती हूँ मैं
भीड़ ,भीड़ ,भीड़
और बीच में मैं
और मेरी यादाश्त खो जाये
कोई याद न आये ।
कमला सिंह 'ज़ीनत'

Friday, 15 August 2014

मुझे वह भारत दे दो
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हाँ मुझे वह भारत दे दो
वह भारत
जो हर साल
चुनावी माहौल में दिखाते हो तुम
विकास करता भारत
गरीबी रहित भारत
भ्रष्टाचार मुक्त भारत
शान्त,शालीन भारत
दंगाई और महंगाई से बचा भारत
खुशहाल भारत
दे दो मुझे
जहाँ हम जी भर साँस ले सकें
आने वाली नसलों को
कुछ दे सकें
मुझे वह भारत दे दो
कमला सिंह 'ज़ीनत'

Thursday, 14 August 2014

स्वाधीनता दिवस की ख़ुशी में एक ग़ज़ल हाज़िर है दोस्तों 
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        अब हमें होश में आना होगा  
        अपनी मिटटी को बचाना होगा

         भूल   बैठे है लोग  कुर्बानी 
         फिर उन्हें याद दिलाना होगा 

         टूट जाने का है बहुत इम्काम 
         दिल से नफरत को मिटाना होगा 

          रास्ते खो गए हैं  जाने कहाँ 
           रास्ता   और बनाना  होगा 

         जिनपे ज़हरीले समर आतें हों 
          उन दरख्तों को गिराना होगा 

         'ज़ीनत' जी बोल दो गद्दारों से 
          अब यहाँ सर ना उठाना होगा 
          ---------कमला सिंह 'ज़ीनत'

Tuesday, 12 August 2014

------------------ग़ज़ल------------------

लफ्ज़ लफ्ज़ का मआनी लिखने आता है
पानी पर भी पानी लिखने आता है

शैतानों की बस्ती में रह कर भी दोस्त
चार लफ्ज़ इंसानी लिखने आता है

धरती की हरियाली पर तो लिखती हूँ
फिर भी दुनिया फा़नी लिखने आता है

शीरीनी अल्फाज़ क़लम को है प्यारी
सच है तल्ख़ ज़बानी लिखने आता है

अपसदारी है हम को महबूब बहुत
लेकिन खींचातानी लिखने आता है

'जी़नत' जा़लिम को हमने जल्लाद लिखा
दानी को पर दानी लिखने आता है

------------------कमला सिंह 'ज़ीनत'