Sunday, 15 June 2014

वो चाहत 
--------------------
वो चाहत क्या ही उम्दा है 
वो चाहत कितनी अच्छी है 
वो चाहत लाज़वाब है 
वो चाहत नर्गिसी  की खुश्बू 
वो चाहत रात की रौनक 
वो चाहत दिन का शहज़ादा 
वो चाहत बोल तो   सकता है 
वो चाहत  गूंगा रहता है 
वो चाहत मौसम ए गरमां 
वो चाहत सर्द की आँधी 
वो चाहत बारिश की बूंदें  
वो चाहत फूल की खुश्बू  
वो चाहत हमारी है 
वो चाहत शान वाला है 
वो चाहत है दुआ मेरी 
वो चाहत चाँद जैसा है 
वो चाहत बर्फ वाली है 
वो चाहत एक दरिया है 
वो चाहत एक कश्ती है 
वो चाहत एक हलचल है
वो चाहत है सफ़ीरों सा 
वो चाहत है फ़क़ीरों सा 
वो चाहत एक दिल जैसा 
मेरे होठों पे तिल जैसा 
---कमला सिंह 'ज़ीनत'

कहते है जिसे पापा सभी ,होता वो लफ्ज़ तो  प्यारा है  
बच्चे  भी कहते हैं उसे,होता वो लफ्ज़ तो  दुलारा है 
न जानूं वो होता है क्या ,जिसको ज़ीनत ने न देखा है 
जैसा भी होता है हो,पर जग में वो लफ्ज़ तो  न्यारा है
------कमला सिंह 'ज़ीनत'
 

Saturday, 14 June 2014

मेरी खातिर लड़ जाएगा 
खून किसी का कर जाएगा 
इतना प्यार है मुझसे उसको 
मैं न रहूँ तो मर जायेगा 
-----कमला सिंह 'ज़ीनत'

Meri khatir lard jaayega
khoon kisi ka kar jayega itna pyaar hai mujhse usko main na rahun to mar jayega
----kamla singh 'zeenat'

Friday, 13 June 2014

बात चुपके से कहता है वो
मेरी आँखों में रहता है वो
खुश रहे .पुतलियाँ तर करे
वरना आँखों से बहता है वो
---कमला सिंह 'ज़ीनत'

Baat chupke se kahta hai wo meri aankhon me rahta hai wo khush rahe putliyaaN tar kare warna aankhon se bahta hai wo
--kamla singh 'zeenat'
एक मतला एक शेर 
_______________________
उसे न देखूं तो दिल ही दहकने लगता है
जिगर के गोशे में कोई सिसकने लगता है
वो ख़्वाब बन कर गुज़रता है जब भी आँखों से
हमारा कमरा सुबह तक महकने लगता है
-----कमला सिंह 'ज़ीनत'

ik matla aik sher Use na dekhun to dil hi dahakne lagta hai jigar ke goshe me koi sisakne lagta hai wo khwaab ban ke guzarta hai jab bhi aankhon se hamara kamra subah tak mahane lagta hai kamla singh zeenat

Friday, 6 June 2014

बहत्तर छेद की कश्ती -------------------------- साहिल पर रोज ही लंगर डालती हैं अनगिनत कश्तियाँ परन्तु मुझे वही कश्ती पसंद है जिसके अंदर है बहत्तर छेद उसकी सवारी का अपना मजा है डूब जाने और पार कर जाने के बीच अपने दोनो हाथों से निकालते रहना पानी कश्ती के पेंदे से बहुत अच्छा लगता है मुझे कल यदि पार करना पडे मुझे वह नदी वह झील वह समुंदर तो फिर चाहूँगी मैं बार बार इसी कश्ती की सवारी सच मुझे बहुत पसंद है बहत्तर छेद की कश्ती कमला सिंह जीनत

Sunday, 1 June 2014

विश्वराज 
----------------
विशाल पहाड़ी पर बैठे हुए विश्वराज 
तुम्हारे नीचे तराई में 
जो दिख रही है हरियाली 
वो मृगमरीचिका है 
सतर्क रहना 
जंगली भैंसों का झुण्ड उस पार खड़ा है 
क़ानून व्यवस्था की नदी में तुम्हारे 
पहरेदार मगरमच्छों ,की संख्या 
बहुत कम  है 
बाड़ लगाओ ,बाड़ लगाओ 
नदी के मुहाने पर दूर तलक 
बाड़ लगाओ 
हरवारों को नियुक्त करो 
जितनी जल्दी हो 
भैसों का झुण्ड मुहाने पर खड़ा है 
बेलगाम,जंगली भैसों के झुण्ड को 
मोड़ने की ज़रूरत है 
याद रहे 
जिस दिन भैसों का झुण्ड बिदकेगा 
नदी को पार करने की अफरा-तफरी में 
तुम्हारे मगरमच्छी पहरेदारों का 
थूथन कुचल जाएगा 
भैसों का जीव सैलाब 
भगधड़ मचाता हुआ 
बेलगाम,तुम्हारे सुनहरे गाँव को 
नुकक्ड़ ,चौपालों को 
खेत खलिहानों को 
रौंदता हुआ 
दूर किसी और नदी के मुहाने तक 
निकल जाएगा 
बेलगाम भैसों को एक 
मज़बूत हरवारे की ज़रूरत है 
भैसों के जीव सैलाब को 
नदी के मुहाने से 
दूर रखना बहुत ज़रूरी है 
अपने गाँव की  सुरक्षा हेतु 
अपनी रक्षा हेतु 
बहुत ज़रूरी है 
सुरक्षा  … 
वर्ना 
टूट जाओगे ,बहुत पछताओगे 
विश्वराज  ……… 
..... कमला सिंह 'ज़ीनत'