Friday, 30 June 2017

एक ग़ज़ल आपके हवाले 
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उस  दिन  पगले  हाथ  से  तेरे छूट गए 
शीशे   जैसा   गिरकर   देखो   टूट  गए 

तेरे   मेरे   जो   भी   रिश्ते   थे    कोमल 
गर्म   हवा   के  चलते  ही  सब रूठ  गए 

प्यास लगी थी मुझको लेकिन सच मानो 
कितनी मुश्किल से मुझ तक दो घूँट गए 

राह  हमारी  बिलकुल  ही  सुनसान  रही 
रहज़न   आये    यादें    तेरी    लूट   गए 

चलते-  चलते   , धीरे -  धीरे   रस्ते  पर 
ग़म   के   सारे    छाले   मेरे   फूट   गए 

क्या अब जीना 'ज़ीनत' बोलो घुट-घुट कर 
ओखल  में  हम  साँसें  सारी   कूट   गए 
---कमला सिंह 'ज़ीनत '

Tuesday, 27 June 2017

एक ग़ज़ल आपके हवाले 
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एक सजदा वही  क़याम हमारी  नज़र  में  है 
अब   तक  वही  इमाम   हमारी  नज़र  में है 

मसरूफ हम है जिसके तआक्कुब में रात दिन 
ऐसा    ही   एक   नाम   हमारी   नज़र  में है 

देखोगे तुम तो  शाम-ए- अवध  भूल जाओगे 
इतनी   हसीन    शाम   हमारी   नज़र  में  है 

दीदार  जिसकी  करते थे  हम ताज की तरह 
खुश- रंग ,  दरो-बाम ,  हमारी  नज़र  में  है 

हर   वक़्त   जो   हमारी   हदें   खींचते   रहे 
उनका   भी  एहतराम   हमारी  नज़र  में  है 

सब  कुछ  फ़ना है 'ज़ीनत 'यादों की भीड़ में 
बस  इक शिकस्ता -जाम  हमारी नज़र में है 
-----कमला सिंह 'ज़ीनत '

Wednesday, 21 June 2017

एक ग़ज़ल देखें 
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अजीब  लोग  हैं  तेवर   बदलते  रहते हैं 
दरो - दीवार  कभी  घर  बदलते  रहते हैं 

ज़मीन प्यारी है  इतनी उड़ान की  ख़ातिर 
परिंदे  रोज़  अलग  पर  बदलते  रहते हैं 

लिखी है खानह बदोशी हमारी क़िस्मत में 
क़दम-क़दम पे यह मंज़र बदलते रहते  हैं 

तबीब  आप  परेशां न हों खुदा  की  क़सम 
अजीब  ज़ख़्म  हैं  नश्तर  बदलते रहते हैं 

कि अब  तो  नेज़े भी बे-फिक्र हो  के बैठेंगे 
शहीद  होने  को  यह सर  बदलते रहते हैं 

ख़ुदा को भूल के ऐ 'ज़ीनत' जी मुसीबत में 
अंगुठियों  के  ही  पत्थर  बदलते  रहते हैं 
---कमला सिंह 'ज़ीनत '

Wednesday, 7 June 2017

मेरी ग़ज़ल मेरी बुक 'शादमानी के फूल से'
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ऐ  ख़ुदा  बोल ,मेरी आँख में  पानी  क्यूँ है 
खूबसूरत  तेरी  दुनियाँ  है तो फ़ानी क्यूँ है 

क्यूँ  सवालों के जवाबात न हो तो  भी सही 
उसकी हर बात में हर बात का मानी क्यूँ है 

मेरे दिल में  भी एक सैलाब गुज़र जाता है 
सिर्फ़  दरिया  में बज़ाहिर ये रवानी क्यूँ है 

रेत  की  ढेर  सी  ढह  जायेंगी  सब दीवारें 
वक़्त बतलाये तो जानूँ की जवानी  क्यूँ है 

चाँद  पे दुःख लिए  होता  नहीं  कोई गरीब 
फिर ये दुनियाँ में कहो ऐसी कहानी क्यूँ है 

बोल 'ज़ीनत'  ये हैं दुनियाँ सभी रंग बेनूर 
ऐसी  सूरत है तो ये दुनियाँ  रूमानी क्यूँ है 
----- कमला सिंह 'ज़ीनत'

Tuesday, 30 May 2017

एक ग़ज़ल देखें 
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खूबसूरत   कोई     रिश्ता   रखिये 
कुछ  तो इंसानियत  ज़िंदा रखिये 

वक़्त   के   साथ   सब  फ़ना  होंगे 
खुद को जैसे भी हो लिखता रखिये 

लोग  आयेंगे  कई  कल  के  साथ 
मख़मली  खुशनुमा  रिश्ता रखिये 

रूह  निकलेगी  कब  किसे  मालूम 
हो   सके   कारवाँ    चलता  रखिये 

महफ़िलों  में  सुख़नवरों  के  साथ 
आप  भी  खुद  को दिखता रखिये 

शोख़  कलियों में आप भी 'ज़ीनत'
ज़िंदगी  भर  यूँ  ही महका रखिये 

----कमला सिंह 'ज़ीनत'

Wednesday, 17 May 2017

मेरी 'माँ'
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दुनिया में उससे सुंदर
मुखडा़ न कोई देखा
दुनिया में उससे अच्छी
तस्वीर भी न पाई
ये मानना था मेरा
शायद हो मेरी चाहत
शायद मेरी मुहब्बत
या मेरे देखने का
अन्दाज़ प्यार का हो
पर ये तो बिल्कुल सच है
ऐसी ही कुछ नज़र है
ऐ 'माँ' तेरा असर है।
****कमला सिंह "जी़नत"

Saturday, 6 May 2017

मौन संवाद
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उम्मीद का घोडा़
जब घायल होता है
सवार के मन में
खोट उतर आता है
घोडा़ लाख घायल हो
दौड़ जारी रखना ही चाहिये उसे
ज़ख़्मी घोडे़ का सवार
बेमरव्वत बन सकता है
बेदिल निकल सकता है
घोडे़ और सवार के बीच
पुचकार का संवाद
स्वस्थ रहने तक
--कमला सिंह 'ज़ीनत'