Tuesday, 22 March 2016

जो अपने पन का तमाशा दिखाते रहते हैं
वही तो लोग "मुखौटा" लगाते रहते हैं

Saturday, 12 March 2016

उफ़्फ़
जब कोई हादसा बे- वक्त़ गुज़र जाता है
बिन कहे आँखों में भी खू़न उतर आता है
कमला सिंह 'ज़ीनत'
एक मतला दो शेर
जिंदगी कब तलक नश्तर रक्खे
कुछ तो मेरे लिये बेहतर रक्खे
जी रही हूँ किसी तरह से मैं
रोज़ कांधे तले बिस्तर रक्खे
ज़ख़्म ही ज़ख़्म से भरी हूँ अभी
जिस्म पे ज़ख़्म के जे़वर रक्खे
तिनका तिनका बटोरती हूँ जब
सुख की चादर को ओढ़ती हूँ जब
तिनका तिनका बिखेर देता है वक्त़
पूरी चादर उधेड़ देता है वक्त़
जब्र के सारे तू दरवाजे तो खोल
ऐ खुदा कितना जुल्म बाकी है बोल
--कमला सिंह 'ज़ीनत'

Thursday, 18 February 2016

रुत हुए सुहाने देखिए , अब गुलों की बात कीजिए 
खुश्बूओं में हो बसर सहर,खुश्बूओं में रात कीजिए
------कमला सिंह "ज़ीनत "



एक शेर
इस तरह हादसे कुछ मेरे सहारे उतरे
जैसे प्यासा कोई दरिया के किनारे उतरे

एक शेर
खुशबू में बसा होगा गुलाबों में मिलेगा
आँखों में तलाशोगे तो ख़्वाबों में मिलेगा

Sunday, 14 February 2016

मेरी नयी पुस्तक जिसका विमोचन ७ फ़रवरी को हुआ उस पुस्तक की एक ग़ज़ल हाज़िर करती हूँ 
-----------------------------------------------------------------------------------------------------
ज़िंदगी अपनी गुज़ारी  है सुख़नवर की तरह 
खुद को रखती हूँ करीने  से मैं ज़ेवर की तरह 

जब कोई  शख़्स  कभी मुझसे  बद-कलाम करे 
मैं मुख़ातिब  तभी हो जाती हूँ तेवर की तरह 

हम  इसी   भीड़  में  चलते हैं  मगर  होश लिए 
कौन मिल जाए कभी मुझसे भी अजगर की तरह 

उससे  मिलने की  बराबर मुझे  होती  है तलब 
मुझसे  मिलता है मेरा अपना भी दिलवर की तरह

जब जब भी  सुकूँ  चाहिए होता  है मुझे ऐसे में 
मैं  बिछा  देती हूँ  उस प्यार को चादर की तरह 

ये  है  'ज़ीनत' का  अलग रंग ज़माना सुन ले 
पास आये ना कोई बनके यूँ नश्तर की तरह 
-----------कमला सिंह 'ज़ीनत'


Sunday, 24 January 2016

जो भी फुटपाथ के किनारे हैं
वे फ़क़त मुफ़्लिसी के मारे हैं
मर ही जाते गरीब ठंडक से
जी रहे आग के सहारे हैं
-----कमला सिंह 'ज़ीनत'