Sunday, 7 June 2015

मेरी एक ग़ज़ल 
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जब  वो  मेरी  नज़र  हो  गया 
खुद-ब-खुद  मोअत्बर हो गया

एक   खाली   मकाँ   हम  रहे 
वो  दिलो  जाँ  ज़िगर हो गया 

अब   कोई   और  चौखट नहीं 
आख़री    मेरा   दर  हो  गया 

धूप   आती   नहीं    राह   में 
राह  का  वो   शजर  हो गया 

रफ़्ता - रफ़्ता   मेरी   चाह  में 
कितना  वो  बालातर हो गया 

दिल का 'ज़ीनत' वो है बादशाह 
दौलते   मालो   ज़र  हो  गया 
----कमला सिंह ;ज़ीनत'
मेरी एक ग़ज़ल 
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जिस्म  मुझसे  ये चाल  चलता है 
तुझको सोचूं तो दिल निकलता है

बाखुदा  सिर्फ - सिर्फ  तेरे  सिवा  
ख़ाना -ए -दिल  में कौन पलता है 

वो  तो  रुत है  बदलने  वाली चीज़ 
तू  तो  सूरज  है  क्यूँ   बदलता  है 

कोई   सूरत  नहीं   मेरे    क़ाबिल 
दिल  के साँचे  में  तू  ही  ढलता है 

रात दिन मेरे  दिल की धड़कन  में 
एक   राही   सा   तू   टहलता   है 

तेरे   रहने   से  पास  'ज़ीनत'  के 
दिल   हमारा   बहुत   बहलता  है 
-----कमला सिंह 'ज़ीनत'

Saturday, 6 June 2015

तेरी यादों की गर्मी से
होशो हवास के पसीने छूट जाते हैं
तेरे होने की तपन से
रेश्मी एहसास का रूमाल भीग जाता है
तू समुंदर की तरह खारा हो जा
और मुझे
अपने खारेपन से
नमकीन कर दे
सिहर उठती है बार बार मेरी रूह
जब जब ख्यालों में
फूंक मारते
दिख जाते हो तुम
उफ् कितना सताते हो तुम
मेरी नींदें उडाते हो तुम
बहुत याद आते हो तुम
तमाशा खुदका बना लेती मैं यकीन करो
तमाशबीनों में तू भी अगर खडा मिलता

Monday, 1 June 2015

ग़रीबों का मौसम
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मैं लिख रही हूँ
अपना बचपन
अपनी ग़रीबी
अपनी बेबसी
बिन पंखे की गर्मी
बिन स्वेटर का जाडा
चूते खपरैल की बरसात
अमीरों के लिए इतने मौसम
ग़रीबों के लिए कुछ भी नहीं
भगवान दाम बता
मुझे ग़रीबों का मौसम खरीदना है ।
---कमला सिंह 'ज़ीनत'