Tuesday, 10 March 2015

दुआ
------------
तिल दुआ मेरी तूल तक पहुँची 
टूटे दिल से नजू़ल तक पहुँची 
जब तड़पती हुई दुआ रख दी
तब दुआ ये कबूल तक पहुँची
---डा.कमला सिंह 'ज़ीनत'

Monday, 9 March 2015

देख के ऐसी , जादू नगरी , दुनिया हो जाए दंग
एक ही रंग में , खो जाएँ सब ,साधू और मलंग
न कोई हिन्दू,न कोई मुस्लिम,कोई सिख न ईसाई
ऐसा रंग चढे़ रंग - रंग पे , छुप जाए सब रंग


रंग बिखराओ होली आई,खुलकर ओ रंगरेज़
रंग चढे़ तो उतर न पाए , शोख़ रंग हो तेज़
खू़ब अमन हो ,खू़ब मिलन हो,झूमें नाचें लोग
इक - इक ज़र्रा , रंग में डूबे , हो हैरतअंगेज़
मेरी सखी , वह रंग लगा तू मन मोरा रंग जाए
तन भीगे , और मन न भीगे , ऐसा रंग न भाए
बरसाने की , ओह रे होली , जो देखे तर जाए
लठ की चोट को तरसे कोई,लठ कोई बरसाए
डा.कमला सिंह 'ज़ीनत'
एक दुआ की गुज़ारिश आप सबसे दोस्तों
--------------------------------------------
जो ग़मज़दा हैं उन्हें न मलूल कर मौला
दुआएँ सुन ले दुआएँ न तूल कर मौला
तड़पते दिल को एनायत से अपनी राहत दे
दुआ को हाथ उठे हैं कुबूल कर मौला
-----डा.कमला सिंह 'ज़ीनत'

Tuesday, 3 March 2015

एक बात दिल की 
-----------------
दर्दों की ज़रदारी चादर 
ज़ख्मों की फुलदारी चादर 
कोर   कोर पे आहें थीं 
ऎसी थी उजियारी चादर 
----कमला सिंह 'ज़ीनत'

Monday, 2 March 2015

एक ग़ज़ल पेश है 
---------------------------------------------
क्या से क्या हो गया है ये संसार 
टूट  कर  बिखरे  हुए   हैं सब तार 

जिसको  देखो   वही  परीशाँ   है
जाने किस रोग से है सब बीमार 

कोई  खुश भी नहीं है दुनियां में 
ये क़यामत  का  है अजी आसार 

दिल  में नफरत का एक मेला है 
हर  कोई  कर रहा है खुद पे वार 

सच  को  तन्हा  ही  छोड़  देते हैं
झूठी  बातों  पे  लोग  हैं   तैयार  

लिखिए 'ज़ीनत' ग़ज़ल को परदे में 
ये  ज़माना  बहुत  ही  है  हुशियार 
---डा.कमला सिंह 'ज़ीनत'

Sunday, 1 March 2015

तय मैं करुँगी
_____________________
इस रास्ते से गुज़रने वाला
हर साया
तुम सा ही लगता है
यह बात
मेरी आँखें कहती हैं
पर मैं नहीं मानती
बिना तुम्हें महसूस किये
अगर चापलूस आँखें मेरी
मुझे ना समझ भी कहती हैं
तो मंजू़र है मुझे
हर क़दम पर हर साये का
रंग और क़द बदलता है
यह आँखों को क्या पता
तभी तो हजा़र बीमारियाँ इन्हीं को हैं
तय मैं करुँगी
साये को देख कर ,महसूस कर