Monday, 5 January 2015

नया साल मुबारक
खु़दा नहीं हो खु़दादाद हो यही माना
करम के बाद भी होता है क्या नहीं जाना
गुज़रते वक्त़ ने कुछ ज़ख़्म गहरे छोडे़ हैं
मसीहा बन के 'नये साल' तुम चले आना
***********ग़ज़ल**********
तेरी नज़रों से उतरने वाले
पहले हम ही रहे मरने वाले
जि़न्दगी दार कर गयी थी हमें
हम ही थे दार पे चढ़ने वाले
सोच कर दर्द बहुत होता है
तुम रहे पर को क़तरने वाले
ये लो दिल की कि़ताब खोल दिया
गुम कहाँ हो गये पढ़ने वाले
है अंधेरा खडा़ घेरे हमको
तुम अंधेरों से थे लड़ने वाले
कुछ क़तारों में अभी हैं 'जी़नत'
हादसे हम पे गुज़रने वाले
कमला सिंह 'ज़ीनत'
था बहुत देर तक ठहरा मुझमें
कोई गूँगा सा था बहरा मुझमें
जाते जाते सितम ये तोड़ गया
दे गया ज़ख़्म वो गहरा मुझमें


चार मिसरे अभी अभी
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गुफ़्तगू से हासिल है गुफ़्तगू की दो सूरत
इक हदूद से बाहर और एक हद वाली
मक्खियों के बारे में जानना ज़रुरी है
कौन बैठे ज़ख़्मों पर कौन है शहद वाली

Wednesday, 24 December 2014

दो ही लफ़्जो़ में लिख दिया सब कुछ
आगे जो कुछ था उसपे छोड़ दिया
हम उसे प्यार बहुत करते हैं
बस यही लिख के क़लम तोड़ दिया